पाठ: हरिद्वार — सम्पूर्ण
प्रश्नोत्तर
पाठ का संक्षिप्त सार
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 14 अक्टूबर 1871 को हरिद्वार की यात्रा की और संपादक के नाम पत्र के रूप में उसका वर्णन किया। हरिद्वार तीन ओर से हरे-भरे पर्वतों से घिरा हुआ है। वहाँ के वृक्ष, लताएँ, पक्षी, गंगा की धाराएँ, घाट, धर्मशालाएँ और प्राकृतिक वातावरण लेखक को अत्यंत आनंद और शांति देते हैं। लेखक ने गंगा की शीतलता, निर्मलता और वेग का सुंदर वर्णन किया है। उन्होंने हर की पैड़ी, नीलधारा, कुशावर्त, विल्वपर्वत और कनखल जैसे तीर्थों का उल्लेख किया है। कनखल को दक्ष-यज्ञ और सती के आत्मदाह से जुड़ा पवित्र स्थान बताया गया है। हरिद्वार में लेखक ने ग्रहण के समय स्नान किया, श्रीमद्भागवत का पारायण किया और गंगा के किनारे पत्थर पर भोजन किया। उन्हें यह साधारण भोजन भी सोने की थाली के भोजन से अधिक आनंददायक लगा।
इस पाठ का मुख्य संदेश है कि यात्रा पुस्तकीय ज्ञान को जीवनानुभव से जोड़ती है और प्रकृति, आध्यात्मिकता, सादगी तथा पर्यावरण-संरक्षण का महत्त्व समझाती है।
1. मेरी समझ से
(क) सही विकल्प चुनिए
1. “सज्जन
ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?
उत्तर: लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को
मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
2. “वैराग्य
और भक्ति का उदय होता था” से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
उत्तर: मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव।
3. “पत्थर पर
का भोजन सोने की थाल से बढ़कर था” का सबसे उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
उत्तर: संतुष्टि में सुख होता है।
4. गंगा के
तट पर भोजन करने का प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?
उत्तर: सादगी और आत्मनिर्भरता; साथ ही यह
प्रकृति-प्रेम और स्वच्छता की भावना भी प्रकट करता है।
5. लेखक का
हरिद्वार-अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
उत्तर: प्राकृतिक और आध्यात्मिक—दोनों प्रकार
का।
6. पत्र की
भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?
उत्तर: सरलता और चित्रात्मकता।
(ख) चर्चा-आधारित उत्तर
सही विकल्प इसलिए चुने गए हैं क्योंकि लेखक ने वृक्षों को सज्जन मनुष्यों के समान उदार बताया है, हरिद्वार के वातावरण से मानसिक शांति और भक्ति का अनुभव किया है तथा गंगा के किनारे साधारण ढंग से भोजन करके सच्चे आनंद को महसूस किया है। पत्र में प्रकृति और धार्मिक वातावरण का ऐसा सजीव वर्णन है कि दृश्य आँखों के सामने उभर आता है।
2. मिलकर करें मिलान
|
क्रम |
शब्द |
सही संदर्भ |
|
1 |
हरिद्वार |
3. भारत के उत्तराखंड राज्य में
स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थान, जहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
|
2 |
गंगा |
5. हिमालय से निकलकर लगभग 1560
मील बहने वाली भारत की प्रधान नदी। |
|
3 |
भागीरथ |
6. अयोध्या के सूर्यवंशी राजा,
जिन्होंने तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाया। |
|
4 |
चण्डिका |
1. मान्यताओं के अनुसार दुर्गा
का एक रूप। |
|
5 |
भागवत |
2. अठारह पुराणों में प्रसिद्ध
पुराण, जिसमें मुख्यतः श्रीकृष्ण-संबंधी कथाएँ हैं। |
|
6 |
दालचीनी |
4. एक सुगंधित पेड़ की छाल,
जिसका उपयोग दवा और मसाले के रूप में होता है। |
3. मिलकर करें चयन
नीचे दिए गए प्रत्येक कथन के लिए
सही निष्कर्ष इस प्रकार हैं।
|
क्रम |
सही निष्कर्ष |
|
1 |
लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ
इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है। |
|
2 |
वृक्ष साधुओं जैसे हैं, जो हर
मौसम सहते हुए तपस्या करते हैं। |
|
3 |
पक्षी प्रकृति में सुरक्षित
अनुभव करते हैं, इसलिए निडर होकर कलरव करते हैं। |
|
4 |
गंगाजल की ठंडक और मिठास का
अनुभव बहुत मनोहारी है। |
|
5 |
लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन
किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है। |
|
6 |
लेखक चाहता है कि पत्र को
महत्त्व देकर प्रकाशित किया जाए। |
4. पंक्तियों पर चर्चा
(क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण
होती है...” का अर्थ
हरिद्वार की भूमि को लेखक अत्यंत
पवित्र मानते हैं। उन्हें वहाँ की कुशा से दालचीनी और जावित्री जैसी सुगंध आती हुई
प्रतीत होती है। अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से वे कहना चाहते हैं कि यह इतनी पवित्र भूमि
है कि यहाँ की साधारण घास में भी सुगंध और विशेषता दिखाई देती है।
(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य
हैं...” का अर्थ
यहाँ ‘इनके’ शब्द वृक्षों के लिए
प्रयुक्त हुआ है। वृक्ष अपने फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी, जड़,
कोयले और राख तक से मनुष्यों का उपकार करते हैं। इसलिए उनका जीवन धन्य है। इस
पंक्ति में वृक्षों की उदारता और परोपकारिता का महत्त्व बताया गया है।
5. सोच-विचार के लिए
(क) “चित्त से तो अब तक वहीं निवास
करता हूँ...” का आशय
इस वाक्य से पता चलता है कि लेखक
का मन हरिद्वार की सुंदरता, पवित्रता और शांत वातावरण में इतना रम गया था कि वहाँ
से लौटने के बाद भी उनका मन वहीं लगा रहा। वे शारीरिक रूप से लौट आए थे, पर मानसिक
रूप से अभी भी हरिद्वार में ही थे।
व्यक्तिगत
उत्तर का उदाहरण: हाँ, किसी सुंदर पहाड़ी स्थान से लौटने के बाद मुझे भी
ऐसा अनुभव हुआ। वहाँ का शांत वातावरण, ठंडी हवा और प्राकृतिक दृश्य बार-बार याद
आते रहे। घर लौटने पर भी कई दिनों तक मन उसी स्थान पर जाने को करता रहा।
(ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण
संतोषी हैं...” का आशय
लेखक व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि
पंडे एक पैसे को लाख मान लेते हैं। इसका अर्थ है कि वे बहुत कम धन से भी संतुष्ट
होने का दिखावा करते हैं अथवा कम धन को बहुत अधिक मानकर स्वीकार कर लेते हैं।
आज भी कुछ लोग कम साधनों में
संतुष्ट रहते हैं, परंतु हर व्यक्ति ऐसा नहीं है। उदाहरण के लिए, कोई ग्रामीण
शिक्षक सीमित वेतन में भी ईमानदारी से सेवा करके संतुष्ट रहता है। दूसरी ओर, कुछ
लोग अधिक धन मिलने पर भी संतुष्ट नहीं होते। इसलिए लेखक का कथन कुछ लोगों पर आज भी
लागू होता है, लेकिन इसे पूरे समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।
(ग) ‘टिकने योग्य’ स्थान की
विशेषताएँ
लेखक ने दीवान कृपा राम के घर के
ऊपर के बंगले को ‘टिकने योग्य’ इसलिए कहा क्योंकि वहाँ चारों ओर से शीतल हवा आती
थी और वातावरण शांत, स्वच्छ तथा सुंदर था। वहाँ ठहरने की सुविधा, आराम, सुरक्षा और
प्रकृति का निकट अनुभव—सभी उपलब्ध थे। इसके अतिरिक्त, वह स्थान आध्यात्मिक साधना,
पाठ, स्नान और विश्राम के लिए भी उपयुक्त था।
(घ) वृक्षों का महत्त्व
वृक्ष फल, फूल, सुगंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ प्रदान करते हैं। वे औषधियों, भोजन, ईंधन और अनेक उपयोगी वस्तुओं का स्रोत हैं। वृक्ष वायु को शुद्ध करते, वर्षा लाने में सहायता करते, मिट्टी को बाँधकर रखते और पक्षियों तथा जीव-जंतुओं को आश्रय देते हैं। जलने के बाद भी उनकी लकड़ी कोयला और राख के रूप में उपयोगी रहती है। इसलिए वृक्षों की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है।
6. अनुमान और कल्पना से
(क) हरिद्वार में आप क्या-क्या करना
चाहेंगे?
मैं हरिद्वार में सबसे पहले गंगा
के तट पर जाकर उसके निर्मल जल और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेना चाहूँगा। मैं हर
की पैड़ी के दर्शन करूँगा, स्वच्छता के नियमों का पालन करते हुए स्नान करूँगा और
गंगा-आरती देखूँगा। नीलधारा, कनखल और विल्वपर्वत जैसे स्थानों का भ्रमण करूँगा।
वहाँ के इतिहास और धार्मिक परंपराओं को समझूँगा, स्थानीय लोगों से बातचीत करूँगा
और प्लास्टिक का प्रयोग न करते हुए प्रकृति की रक्षा करूँगा।
(ख) गंगा के छींटों का अनुभव
गंगा के तट पर बैठते ही ठंडी हवा
मेरे चेहरे को छूती है। लहरों से उछलकर आए पानी के छोटे-छोटे छींटे माथे और गालों
पर पड़ते हैं। मन में ताजगी और शांति भर जाती है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति स्वयं
मुझे आशीर्वाद दे रही हो। पानी की कलकल ध्वनि, पक्षियों का स्वर और ठंडी फुहार
मिलकर एक अद्भुत अनुभव उत्पन्न करते हैं।
(ग) यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह
व्यवहार करने लगें
यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह
व्यवहार करने लगें, तो वे अपने सुख-दुख और आवश्यकताएँ व्यक्त कर सकेंगे। वे पानी
माँगेंगे, कटने का विरोध करेंगे और मनुष्यों को फल-फूल देने से पहले उनसे प्रेम
तथा सुरक्षा की अपेक्षा करेंगे। वे शायद प्रदूषण और अंधाधुंध कटाई के विरुद्ध सभा
भी करेंगे। इससे मनुष्य को समझ आएगा कि पेड़ भी संवेदनशील और जीवनदायी साथी हैं।
(घ) ‘श्री’ और ‘जी’ लगाने का कारण
‘श्री’ और ‘जी’ सम्मानसूचक शब्द
हैं। गंगा भारतीय संस्कृति में पवित्र और पूजनीय नदी मानी जाती है। इसलिए लेखक ने
उसके प्रति श्रद्धा, आदर और भक्ति प्रकट करने के लिए ‘श्री गंगा जी’ लिखा है।
(ङ) श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित
व्यक्ति के साथ यात्रा के सुझाव
यात्रा से पहले मार्ग, ठहरने की जगह और आवश्यक सुविधाओं की जानकारी लेनी चाहिए। दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए सुरक्षित रास्ता, रेलिंग, स्पर्श-संकेत और साथ चलने वाला सहायक होना चाहिए। श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए लिखित निर्देश, संकेत-चिह्न, मोबाइल संदेश और दृश्य घोषणाएँ उपलब्ध होनी चाहिए। भोजन, शौचालय, विश्राम और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था पहले से करनी चाहिए। उसके निर्णय और आत्मसम्मान का पूरा ध्यान रखना चाहिए, केवल दया नहीं बल्कि सहयोग और समान भागीदारी का भाव रखना चाहिए।
7. लिखें संवाद
(क) लेखक और कल्लू जी का संवाद
लेखक:
कल्लू जी, हरिद्वार का वातावरण कितना शांत और पवित्र है!
कल्लू जी: सचमुच, यहाँ आते ही मन का सारा तनाव
दूर हो जाता है।
लेखक: देखिए, पर्वतों पर फैली हरी लताएँ कितनी
सुंदर लग रही हैं।
कल्लू जी: और वृक्षों पर बैठे पक्षी भी कितने
निडर होकर चहचहा रहे हैं।
लेखक: आज रात ग्रहण के समय गंगा-स्नान करेंगे।
कल्लू जी: अवश्य। दिन में श्रीभागवत का पाठ भी
करेंगे।
लेखक: कल मैं गंगा के किनारे भोजन बनाऊँगा।
कल्लू जी: तब तो वह भोजन किसी राजभोज से भी
अधिक आनंद देगा।
लेखक: यही तो इस यात्रा का विशेष सुख है—सादगी
में आनंद।
(ख) लेखक और प्रकृति का संवाद
पर्वत:
यात्री, तुम हमारे पास क्यों आए हो?
लेखक: तुम्हारी हरियाली, ऊँचाई और शांति मुझे आकर्षित
करती है।
पर्वत: हम वर्षों से धूप, वर्षा और ओस सहकर
यात्रियों को छाया और सुंदरता देते हैं।
लेखक: तुम्हारी गोद में आकर मेरा मन निर्मल हो
जाता है।
गंगा: और मेरे जल का स्पर्श तुम्हें कैसा लगता
है?
लेखक: तुम्हारा जल शीतल, स्वच्छ और पवित्र है।
वृक्ष: हम फल, फूल, छाया और जीवन देते हैं;
क्या मनुष्य हमारी रक्षा करेगा?
लेखक: अवश्य। मैं लोगों को पेड़ लगाने और
प्रकृति को स्वच्छ रखने के लिए प्रेरित करूँगा।
प्रकृति: तब तुम सचमुच हमारे मित्र कहलाओगे।
8. ‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग
1
प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं,
वे अभी सभा में उपस्थित हैं।
2
माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, हमें उनका कहना मानना चाहिए।
3
मेरी बहन बाजार जा रही है,
वहाँ से किताबें ले आएगी।
4
बाहर फेरीवाला है। उसे
बुलाओ।
5
डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी
बुला लाओ।
6
आप तो बहुत दिन बाद आए हैं,
आपका स्वागत है।
7
डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं,
उनसे परामर्श लेना चाहिए।
8
आपके माता-पिता कहाँ हैं?
क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?
9
ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं,
हम उनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
10
बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है।
यहाँ सम्मानित एकवचन व्यक्तियों—जैसे प्रधानाचार्य जी, डाकिया जी और डॉक्टर साहब—के साथ आदरार्थ बहुवचन ‘हैं’ का प्रयोग हुआ है।
9. भावों की पहचान
|
क्रम |
पंक्ति |
प्रकट भाव |
|
1 |
पत्थर पर का भोजन सोने की थाल के
भोजन से बढ़कर था। |
संतोष |
|
2 |
चित्त में बारंबार ज्ञान,
वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। |
वैराग्य और भक्ति |
|
3 |
पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण
संतोषी हैं। |
हास्य/व्यंग्य |
|
4 |
हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता
बिखरी हुई थी। |
शांति |
|
5 |
सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल
देते हैं। |
परोपकार |
10. काल की पहचान
(क) दिए गए वाक्यों में काल
|
क्रम |
वाक्य |
काल |
|
1 |
निश्चय है कि आप इस पत्र को
स्थानदान दीजिएगा। |
भविष्यत् काल |
|
2 |
यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे
पर्वतों से घिरी है। |
वर्तमान काल |
|
3 |
वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से
फल देते हैं। |
वर्तमान काल |
|
4 |
चित्त में बारंबार ज्ञान,
वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। |
भूतकाल |
|
5 |
मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर
के बंगले पर टिका था। |
भूतकाल |
(ख) वाक्यों को अन्य कालों में
बदलना
11
मूल: आप इस पत्र को स्थानदान
दीजिएगा।
वर्तमान: आप इस पत्र को स्थानदान देते हैं।
भूत: आपने इस पत्र को स्थानदान दिया था।
12
मूल: यह भूमि पर्वतों से
घिरी है।
भविष्य: यह भूमि पर्वतों से घिरी होगी।
भूत: यह भूमि पर्वतों से घिरी थी।
13
मूल: वृक्ष पत्थर मारने से
फल देते हैं।
भविष्य: वृक्ष पत्थर मारने से फल देंगे।
भूत: वृक्ष पत्थर मारने से फल देते थे।
14
मूल: चित्त में भक्ति का उदय
होता था।
वर्तमान: चित्त में भक्ति का उदय होता है।
भविष्य: चित्त में भक्ति का उदय होगा।
15
मूल: मैं बंगले पर टिका था।
वर्तमान: मैं बंगले पर ठहरा हूँ।
भविष्य: मैं बंगले पर ठहरूँगा।
11. पत्र की विशेषताओं का मिलान
|
क्रम |
विशेषता |
सही उदाहरण |
|
1 |
व्यक्तिपरकता |
“ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक
स्नान किया...” |
|
2 |
संवादात्मकता |
“श्रीमान् कविवचन सुधा संपादक
महामहिम मित्रवरेषु!” |
|
3 |
स्वाभाविक शैली |
“मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने
में बड़ा आनंद होता है...” |
|
4 |
व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन |
“एक दिन मैंने श्री गंगा जी के
तट पर रसोई करके...” |
|
5 |
अभिवादन या संबोधन |
“श्रीमान् कविवचन सुधा संपादक
महामहिम मित्रवरेषु!” |
|
6 |
हस्ताक्षर |
“आपका मित्र—यात्री” |
|
7 |
उपसंहार और निवेदन |
“निश्चय है कि आप इस पत्र को
स्थानदान दीजिएगा।” |
|
8 |
मुख्य विषय-वस्तु |
हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता,
धार्मिकता, साधु-संतों का जीवन, गंगा और तीर्थों का वर्णन। |
यात्रा-वर्णन संबंधी पत्र
स्थान: नई
दिल्ली
दिनांक: 17 अगस्त 2026
प्रिय मित्र
राहुल,
सप्रेम नमस्कार। आशा है कि तुम
स्वस्थ और प्रसन्न होगे। पिछले सप्ताह मैं अपने परिवार के साथ आगरा गया था। हमने
सबसे पहले ताजमहल देखा। सफेद संगमरमर से बना यह भवन चाँदनी में बहुत सुंदर दिखाई
देता था। हमने आगरा किला, मेहताब बाग और स्थानीय बाजार भी देखे। वहाँ की इमारतों
में इतिहास और कला का अद्भुत मेल दिखाई देता है।
यात्रा के दौरान हमने स्थानीय भोजन
का स्वाद लिया और यमुना नदी के किनारे कुछ समय बिताया। इस यात्रा से मुझे इतिहास
को पुस्तकों के साथ-साथ प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। तुम भी अवसर मिलने
पर आगरा अवश्य जाना।
तुम्हारा मित्र,
अमित
12. ‘हरिद्वार’ से जुड़े शब्द
|
प्रकृति |
तीर्थ और धर्म |
यात्रा और स्थान |
|
पर्वत |
गंगा |
घाट |
|
वृक्ष |
हर की पैड़ी |
धर्मशाला |
|
पक्षी |
कनखल |
दुकान |
|
हरियाली |
भागवत |
यात्री |
|
शीतल वायु |
चण्डिका देवी |
स्नान |
अन्य उपयुक्त शब्द: नीलधारा,
कुशावर्त, विल्वपर्वत, साधु, पंडे, गंगा-आरती, तीर्थयात्रा, नदी, जल, प्रकृति।
13. लेखन के अनोखे तरीके
(क) तुलनात्मक वाक्यों के विशिष्ट
रूप
16
वृक्षों की तुलना साधुओं से:
“बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं
की भाँति धाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।”
17
गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से:
“जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में
जमाया है।”
18
हरियाली की तुलना गलीचे से:
“वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचे की यात्रियों के
विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
19
नदी की धारा की तुलना भागीरथ की
कीर्ति से: “गंगा जी की पवित्र धारा राजा भागीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की
लता-सी दिखाई देती है।”
(ख) प्राचीन भाषा को आज की हिंदी
में लिखिए
20
आधुनिक हिंदी: इन पेड़ों पर
अनेक रंगों के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट शिकारियों से निडर होकर आनंद से
कलरव करते हैं।
21
आधुनिक हिंदी: वर्षा के कारण
चारों ओर हरियाली दिखाई देती थी। ऐसा लगता था मानो यात्रियों के आराम करने के लिए
हरे रंग का गलीचा बिछा हुआ हो।
22
आधुनिक हिंदी: यह इतना
पवित्र तीर्थ है कि क्रोधी स्वभाव वाले लोग वहाँ रह ही नहीं सकते।
23
आधुनिक हिंदी: वहाँ पहुँचते
ही मेरा मन इतना प्रसन्न और शांत हो गया कि मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता।
24
आधुनिक हिंदी: रात को ग्रहण
पड़ा और हमने ग्रहण के समय बहुत आनंद से स्नान किया। दिन में हमने श्रीमद्भागवत का
पाठ भी किया।
25
आधुनिक हिंदी: उस समय पत्थर
पर बैठकर किया गया भोजन सोने की थाली में किए गए भोजन से कहीं अधिक सुखद था।
26
आधुनिक हिंदी: मुझे विश्वास
है कि आप इस पत्र को महत्त्व देकर प्रकाशित करेंगे।
(ग) प्राचीन वर्तनी और आधुनिक
वर्तनी
|
प्राचीन/पाठ में प्रयुक्त रूप |
आधुनिक रूप |
|
शिषर |
शिखर |
|
जात्रियों |
यात्रियों |
|
दुष्ट बधकों |
दुष्ट बधिकों/शिकारियों |
|
मिष्ट |
मीठा |
|
मनोर्थ |
मनोरथ |
|
चित्त |
मन |
|
स्थनदान |
स्थानदान/प्रकाशन के लिए स्थान
देना |
|
नीरमल |
निर्मल |
14. आपकी बात
(1) प्रकृति के पास भोजन का अनुभव
मैंने एक बार खुले मैदान में
पेड़ों की छाया के नीचे भोजन किया। घर के भोजन की तुलना में वहाँ का भोजन अधिक
स्वादिष्ट लगा, क्योंकि ठंडी हवा, पक्षियों की आवाज और खुले वातावरण ने मन को
प्रसन्न कर दिया था। इससे समझ में आया कि भोजन का आनंद केवल व्यंजन से नहीं, वातावरण
और मन की प्रसन्नता से भी बढ़ता है।
(2) साधारण वस्तु से मिला गहरा सुख
एक बार मुझे किसी महँगी वस्तु के
बजाय अपने परिवार द्वारा बनाया गया साधारण भोजन बहुत सुखद लगा। भोजन सादा था, पर
सब लोग साथ बैठे थे और प्रेम से बातचीत कर रहे थे। उस क्षण ने मुझे सिखाया कि
सच्चा सुख वस्तु की कीमत में नहीं, उससे जुड़े प्रेम और अपनत्व में होता है।
(3) पवित्रता और प्रसन्नता का स्थान
मुझे मंदिर के शांत प्रांगण और नदी
के किनारे पवित्रता तथा प्रसन्नता का अनुभव होता है। वहाँ की शांति, स्वच्छता,
प्रार्थना की ध्वनि और प्राकृतिक वातावरण मन को स्थिर करते हैं। ऐसे स्थान पर जाने
से चिंताएँ कम होती हैं और मन में सकारात्मक विचार आते हैं।
(4) विशेष जुड़ाव वाला प्राकृतिक तत्व
मुझे नीम का पेड़ बहुत प्रिय है।
वह गर्मी में छाया देता है, हवा को शुद्ध करता है और औषधीय रूप से भी उपयोगी है।
बचपन से उसके नीचे खेलने और बैठने की यादें जुड़ी हैं। इसलिए उसके प्रति मेरा
विशेष भावनात्मक जुड़ाव है।
15. प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण
जन-जागरूकता पोस्टर
तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!
गंगा को
स्वच्छ रखें।
प्लास्टिक नदी में न डालें।
पेड़ लगाएँ और उनकी रक्षा करें।
कूड़ा निर्धारित स्थान पर डालें।
जल, जंगल और जीव-जंतुओं का सम्मान करें।
प्रकृति बचेगी तो तीर्थ बचेगा और हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।
आइए, स्वच्छ
तीर्थ और सुरक्षित पृथ्वी का संकल्प लें।
16. स्वास्थ्य और योग
(क) पाँच मिनट के ध्यान का अनुभव
मैं पाँच मिनट शांत बैठा और अपने
आस-पास की ध्वनियों को ध्यान से सुना। मुझे पक्षियों की आवाज, हवा की सरसराहट और
दूर से आती लोगों की बातचीत सुनाई दी। फिर मैंने अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित
किया। आरंभ में मन बार-बार भटकता रहा, लेकिन धीरे-धीरे श्वास नियमित हुई और मन
शांत होने लगा। इस अभ्यास से मुझे लगा कि कुछ मिनटों का मौन भी तनाव कम कर सकता है
और एकाग्रता बढ़ा सकता है।
(ख) अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की
सूचना
विद्यालय का
नाम: राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय
सूचना
दिनांक: 10
जून 2026
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कार्यक्रम
सभी विद्यार्थियों को सूचित किया
जाता है कि 21 जून को प्रातः 7 बजे विद्यालय के सभागार में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
मनाया जाएगा। कार्यक्रम में सामूहिक योगाभ्यास, प्राणायाम, ध्यान और योग के लाभों
पर भाषण आयोजित किए जाएँगे। सभी विद्यार्थी खेल-वेश में समय पर उपस्थित हों और
अपने साथ योग-चटाई लाएँ।
प्रधानाचार्य
17. सज्जन वृक्ष
(क) पौधे का परिचय
मैंने एक नीम का पौधा लगाया है और
उसका नाम ‘हरित मित्र’ रखा है। मैं उसे प्रतिदिन पानी
देता हूँ, उसके आसपास की मिट्टी को ढीला करता हूँ और उसकी रक्षा के लिए छोटा-सा
घेरा बनाता हूँ। मैं उसके पत्तों और बढ़ती शाखाओं का ध्यान रखता हूँ। मेरा लक्ष्य
है कि वह बड़ा होकर लोगों को छाया, स्वच्छ हवा और औषधीय लाभ दे।
(ख) दैनिक डायरी का नमूना
12 जून:
आज मैंने हरित मित्र को पानी दिया और उसके पास की घास हटाई। उसमें दो नई पत्तियाँ
निकली हैं।
18 जून: तेज धूप थी, इसलिए शाम को अतिरिक्त
पानी दिया। पौधे के चारों ओर मिट्टी चढ़ाई।
25 जून: वर्षा के बाद पौधा अधिक हरा दिखाई
दिया। मैंने उसके पास प्लास्टिक का कचरा नहीं रहने दिया।
5 जुलाई: पौधा पहले से ऊँचा हो गया है। मैंने
उसे सहारा देने के लिए लकड़ी की छोटी खपच्ची बाँधी।
18. ‘शीतल’ शब्द-चित्र
|
पहलू |
उत्तर |
|
अर्थ |
ठंडा, सुखद और मन को राहत देने
वाला |
|
समानार्थी शब्द |
ठंडा, शीत, हिम-स्पर्शी |
|
विलोम शब्द |
उष्ण, गरम |
|
वाक्य-प्रयोग |
गंगा की शीतल वायु ने यात्रियों
को बहुत राहत दी। |
अन्य शब्दों के लिए भी इसी प्रकार
अर्थ, समानार्थी, विलोम और वाक्य-प्रयोग लिखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए— निर्मल: अर्थ ‘स्वच्छ’; समानार्थी ‘पवित्र’; विलोम ‘मलिन’;
वाक्य ‘गंगा का निर्मल जल मन को आकर्षित करता है।’
19. यात्रा के व्यय की गणना
(क) ₹1000 का व्यय-विवरण
मान लीजिए कि यात्रा एक दिन की है
और निकटवर्ती ऐतिहासिक नगर की है।
|
मद |
राशि |
|
आने-जाने का बस किराया |
₹400 |
|
नाश्ता |
₹100 |
|
दोपहर का भोजन |
₹200 |
|
पानी और हल्का जलपान |
₹80 |
|
प्रवेश शुल्क |
₹70 |
|
स्थानीय वाहन/रिक्शा |
₹80 |
|
आपातकालीन बचत |
₹50 |
|
कुल |
₹980 |
इस प्रकार ₹20 शेष बचेंगे। यात्रा
में पानी की बोतल और घर का हल्का भोजन साथ ले जाने से खर्च और कम किया जा सकता है।
(ख) स्मृति-चिह्न
मैं ₹20 से स्थानीय हस्तशिल्प का
छोटा-सा बुकमार्क या पोस्टकार्ड खरीदूँगा। यह हल्का, सस्ता और उपयोगी होगा। मैं
ऐसी वस्तु नहीं खरीदूँगा जिसकी आवश्यकता न हो या जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचे।
20. यात्रा सबके लिए
(क) यात्रा को सुविधाजनक बनाने के
उपाय
मार्गदर्शक के रूप में मैं यात्रा
से पहले सभी यात्रियों की आयु, स्वास्थ्य और विशेष आवश्यकताओं की जानकारी लूँगा।
सुरक्षित और कम कठिन मार्ग चुनूँगा। विश्राम, पानी, भोजन, शौचालय और प्राथमिक
उपचार की व्यवस्था करूँगा। समूह को छोटे दलों में बाँटकर साथ रहने के नियम
समझाऊँगा। दृष्टिबाधित व्यक्ति को स्पर्श और मौखिक विवरण दूँगा, श्रवणबाधित
व्यक्ति को लिखित निर्देश और संकेत दूँगा, तथा चलने में कठिनाई वाले व्यक्ति के
लिए रैंप, सहारा और वाहन की व्यवस्था करूँगा।
(ख) श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए
आवश्यक सुविधाएँ
श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए लिखित
सूचना, स्पष्ट संकेत-चिह्न, मोबाइल संदेश, मानचित्र और दृश्य घोषणाएँ आवश्यक हैं।
गाइड को सामने देखकर धीरे-धीरे बोलना चाहिए ताकि वह होंठों की गति समझ सके।
आपातकालीन स्थिति के लिए प्रकाश-संकेत और कंपन-सूचना उपयोगी होगी। समूह के सभी
सदस्यों को संकेतों और सहयोग के तरीकों की जानकारी होनी चाहिए।
(ग) ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा
धरोहरों की दीवारों पर लिखना या
उन्हें छूकर नुकसान पहुँचाना नहीं चाहिए। कूड़ा नहीं फैलाना, प्लास्टिक का उपयोग
कम करना, निर्धारित मार्ग से ही चलना और किसी वस्तु को तोड़ना या उठाना नहीं
चाहिए। तेज आवाज, धूम्रपान और आग जलाने से बचना चाहिए। स्थानीय नियमों का पालन
करना और दूसरों को भी संरक्षण के लिए प्रेरित करना चाहिए।
21. आज की पहेली
|
क्रम |
संकेत |
उत्तर |
|
1 |
एक मसाले का नाम |
दालचीनी |
|
2 |
कपास से जुड़ा एक शब्द |
रूई |
|
3 |
जहाँ स्नान होता है |
घाट |
|
4 |
वृक्ष के किसी अंग का नाम |
जड़ |
|
5 |
एक नगर या तीर्थ का नाम |
हरिद्वार |
|
6 |
व्यापार से जुड़ा स्थान |
दुकान |
|
7 |
एक नदी का नाम |
गंगा |
|
8 |
एक पर्वत का नाम |
विल्वपर्वत |
|
9 |
एक धार्मिक ग्रंथ का नाम |
भागवत |
समापन
‘हरिद्वार’ पाठ प्रकृति के
सौंदर्य, तीर्थ की पवित्रता, यात्रा से मिलने वाले ज्ञान, सादगी, संतोष और वृक्षों
के परोपकारी स्वरूप को सामने लाता है। लेखक का अनुभव बताता है कि किसी स्थान की
यात्रा तभी सार्थक होती है जब हम उसके इतिहास, संस्कृति, प्रकृति और लोगों को
समझें तथा वहाँ की स्वच्छता और सुरक्षा का दायित्व भी निभाएँ।
स्रोत:
संलग्न PDF, पाठ ‘हरिद्वार’, कक्षा-पुस्तक ‘मल्हार’, पुनर्मुद्रण 2026–27।
0 Comments