द्वितीयः पाठः - अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
अध्याय का हिंदी में सार
पहला पैराग्राफ (मित्रों का उत्तराखंड भ्रमण और संकट)
कुछ मित्र विद्यालय की गर्मियों की छुट्टियों में पुण्यक्षेत्र दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखंड गए। उस समय वर्षा ऋतु का आरंभ था। सभी गौरीकुंड नामक स्थान पर पहुँचे। जब वे श्री केदारक्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे, तभी लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा शुरू हो गई। अचानक चारों ओर अँधेरा छा गया। नदी के तेज़ जलप्रवाह से पुल टूट गया। भूस्खलन हो गया। सभी ऊँची आवाज़ में चिल्लाने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे, 'हे भगवान! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो!'
सभी के अधीरता को देखकर नायक सुधीर ने सभी को सांत्वना देते हुए और प्रेरित करते हुए कहा –
नायक: अरे मित्रों! इस विपत्ति के समय में हम धैर्य धारण करके कोई उपाय सोचते हैं।
दिनेश: (दुःख के साथ) अरे भाई! क्या कहते हो? हमारी मृत्यु ही निकट है। ऐसे में उपाय कैसे सोचा जा सकता है?
नायक: मित्र! दुःख मत करो। जब वर्षा शांत हो जाएगी और वातावरण स्वच्छ हो जाएगा, तब हम सब मिलकर पुल और मार्ग बनाकर फिर से अपने लक्ष्य की ओर चलेंगे।
दूसरा पैराग्राफ (नायक का प्रोत्साहन और हितोपदेश की कथा)
सुरेश: इस स्थिति में हम यह अत्यंत दुःसाध्य और असंभव कार्य कैसे कर सकते हैं?
नायक: प्रिय मित्रों! हम आत्मविश्वास के बल पर यह असंभव कार्य भी मिलकर अवश्य कर सकते हैं। इससे हमें लक्ष्य की प्राप्ति होगी और प्राणों की रक्षा भी होगी।
नायक: निश्चित रूप से संभव है मित्र! इस प्रसंग में मैं तुम्हें हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।
सभी: (उत्सुकता से) कौन सी कथा? बताओ मित्र! बताओ।
तीसरा पैराग्राफ (हितोपदेश की कथा का आरंभ - कबूतर और शिकारी)
गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल सेमल का पेड़ था। वहाँ प्रतिदिन दूर देशों से पक्षी आकर रहते थे। एक बार कोई शिकारी चावल के दाने बिखेरकर और जाल फैलाकर छिपा हुआ बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा अपने परिवार के साथ आकाश मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतरों ने वन के बीच चावल के दानों को देखकर लालच में आ गए। तब चित्रग्रीव ने चावल के दानों के प्रति लालची कबूतरों से कहा – "इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से संभव हैं, इसकी जाँच करो। कोई शिकारी यहाँ हो सकता है। बिना सोचे-समझे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।" यह वचन सुनकर एक कबूतर ने गर्व से कहा – "आह! ऐसा क्यों कहा जा रहा है?
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते।सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ १ ॥ (अर्थ: विपत्ति आने पर वृद्धों की बात माननी चाहिए। यदि हर जगह ऐसा ही विचार किया जाए, तो भोजन भी नहीं किया जा सकता।)
उसकी बात सुनकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सभी कबूतर भूमि पर उतरकर चावल के दाने खाने लगे।
चौथा पैराग्राफ (कबूतर जाल में फँसे और चित्रग्रीव की बुद्धिमत्ता)
इसके बाद वे सभी उस जाल से बँध गए। तब जिस कबूतर के कहने पर वे वहाँ बँधे थे, सभी उसकी निंदा करने लगे। यह देखकर चित्रग्रीव ने कहा – "यह इसका दोष नहीं है। अनागत विपत्ति को कौन जान सकता है? अतः इस विपत्ति के समय में हमें इसकी निंदा न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि विपत्ति के समय में आश्चर्य करना ही कायरों का लक्षण है। सज्जनों का लक्षण तो यह है –
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौप्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥ (अर्थ: विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश में अभिरुचि और शास्त्रों में आसक्ति – ये सब महात्माओं के स्वाभाविक गुण हैं।)
इसलिए अब हमें धैर्य धारण करके उपाय सोचना चाहिए। प्रिय मित्रों! छोटी-छोटी वस्तुओं का भी समूह कार्य को सिद्ध करने वाला होता है, यह नीतिवचन लोकप्रसिद्ध है। अतः हम सभी को एकचित्त होकर जाल को लेकर उड़ जाना चाहिए।"
ऐसा विचार करके सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।
पाँचवाँ पैराग्राफ (शिकारी का पीछा छोड़ना और हिरण्यक से सहायता)
इसके बाद वह शिकारी दूर से जाल को ले जाते हुए उन पक्षियों को देखकर पीछे दौड़ा, परंतु पक्षियों के उसकी दृष्टि से दूर चले जाने पर वह शिकारी लौट गया। तब शिकारी को लौटा हुआ देखकर कबूतरों ने कहा – "स्वामी! अब क्या करना उचित है?"
चित्रग्रीव ने कहा – "प्रिय कबूतरों! हमारा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गंडकी नदी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह अपने दाँतों के बल से हमारे बंधनों को काट देगा।" यह सोचकर सभी हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक हमेशा अनिष्ट की आशंका से सौ दरवाजों वाला बिल बनाकर रहता था। तब हिरण्यक कबूतरों के गिरने के भय से चकित होकर चुपचाप बैठा रहा। चित्रग्रीव ने कहा – "मित्र हिरण्यक! क्या तुम हमसे बात नहीं करोगे?" तब हिरण्यक उस वचन को पहचानकर आनंद से शीघ्रता से बाहर निकलकर बोला – "आह! मैं पुण्यवान हूँ, मेरा प्रिय मित्र चित्रग्रीव आ गया है।"
छठा पैराग्राफ (हिरण्यक कबूतरों को मुक्त करता है और कहानी का नैतिक)
जाल में बँधे कबूतरों को देखकर वह आश्चर्यचकित होकर क्षण भर रुका और बोला – "मित्र! यह क्या है?"
चित्रग्रीव ने कहा – "मित्र! यह हमारी विचारहीनता का फल है।" यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन को काटने के लिए शीघ्रता से आगे बढ़ा। तब चित्रग्रीव ने कहा – "मित्र! ऐसा मत करो। पहले मेरे आश्रित इन सभी के बंधनों को काटो, बाद में मेरे।" यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन वाला और पुलकित होकर बोला – "साधु मित्र! साधु! इस आश्रितवात्सल्य से तुम तीनों लोकों का स्वामित्व प्राप्त करने योग्य हो।" तब हिरण्यक ने अपने मित्रों के साथ सभी कबूतरों के बंधन काट दिए। सभी कबूतर जाल से मुक्त हो गए। सहर्ष फिर से उड़कर आकाश मार्ग से जाते हुए सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करने लगे – "आपकी नीति शिक्षा और नायक धर्म से हम सभी सुरक्षित हैं। हम धन्य हैं।"
कथा सुनाकर नायक सभी को संबोधित करता है – "मित्रों! विपत्तिग्रस्त कबूतरों ने बुद्धि बल और संगठन सामर्थ्य से अपनी रक्षा की। तो फिर हम संगठित होकर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकते?" नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सभी ने भय, शोक और संदेह को त्यागकर पुल निर्माण कार्य में लग गए। भगीरथ प्रयासों से पुल का निर्माण करके उन्होंने अपने प्राणों और दूसरों के प्राणों की रक्षा की।
शब्दार्थ (Word Meanings)
१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत — (नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर एक पद में लिखें —)
(क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति ? (मित्र गर्मियों की छुट्टियों में कहाँ जाते हैं?)
उत्तर: उत्तराखण्डम् (उत्तराखंड)
(ख) सर्वत्र कः प्रसृतः ? (सब जगह क्या फैल गया?)
(ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत् ? (किसने सभी को प्रेरित करते हुए कहा?)
उत्तर: नायकः सुधीरः (नायक सुधीर)
(घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति ? (कौन हितोपदेश की कथा सुनाता है?)
(ङ) कपोतराजस्य नाम किम् ? (कबूतरों के राजा का नाम क्या है?)
उत्तर: चित्रग्रीवः (चित्रग्रीव)
(च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान् ? (शिकारी ने क्या बिखेरकर जाल फैलाया?)
उत्तर: तण्डुलकणान् (चावल के दानों को)
(छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम् ? (विपत्ति के समय आश्चर्य किसका लक्षण है?)
उत्तर: कापुरुषलक्षणम् (कायरों का लक्षण)
(ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति ? (चित्रग्रीव का मित्र हिरण्यक कहाँ रहता है?)
उत्तर: गण्डकीतीरे चित्रवने (गंडकी नदी के किनारे चित्रवन में)
(झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति ? (चित्रग्रीव हिरण्यक को कैसे संबोधित करता है?)
(ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति ? (पहले किसके बंधनों को काटो ऐसा चित्रग्रीव कहता है?)
उत्तर: मदाश्रितानाम् (मेरे आश्रितों के)
२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत — (पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखें —)
(क) यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत् ? (जब केदारक्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे तब क्या हुआ?)
उत्तर: यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा, सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः, नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः, पर्वतस्खलनं च सञ्जातम्। (जब वे श्रीकेदारक्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा शुरू हो गई, अचानक चारों ओर अँधेरा छा गया, नदी के तेज़ जलप्रवाह से पुल टूट गया, और भूस्खलन भी हो गया।)
(ख) सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त ? (सभी ऊँची आवाज़ में क्या प्रार्थना कर रहे थे?)
उत्तर: सर्वे उच्चस्वरेण ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति प्रार्थयन्त। (सभी ऊँची आवाज़ में ‘हे भगवान! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो’ ऐसी प्रार्थना कर रहे थे।)
(ग) असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान् ? (असंभव कार्य कैसे किया जा सकता है ऐसा नायक ने कहा?)
उत्तर: नायकः उक्तवान् यत् वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः। (नायक ने कहा कि हम आत्मविश्वास के बल पर यह असंभव कार्य भी मिलकर अवश्य कर सकते हैं।)
(घ) निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति ? (निर्जन वन में चावल के दानों को देखकर चित्रग्रीव क्या बताता है?)
उत्तर: निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः निरूपयति यत् कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः, कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत्, सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्। (निर्जन वन में चावल के दानों को देखकर चित्रग्रीव बताता है कि इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से संभव हैं, कोई शिकारी यहाँ हो सकता है, बिना सोचे-समझे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।)
(ङ) किं नीतिवचनं प्रसिद्धम् ? (कौन सा नीतिवचन प्रसिद्ध है?)
उत्तर: अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्। (छोटी-छोटी वस्तुओं का भी समूह कार्य को सिद्ध करने वाला होता है, यह नीतिवचन लोकप्रसिद्ध है।)
(च) व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत् ? (शिकारी से रक्षा पाने के लिए चित्रग्रीव ने किसको आदेश दिया?)
उत्तर: व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः हिरण्यकं नाम मूषकराजम् आदेशं दत्। (शिकारी से रक्षा पाने के लिए चित्रग्रीव ने हिरण्यक नामक चूहों के राजा को आदेश दिया।)
(छ) हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः ? (हिरण्यक क्यों चुपचाप बैठा रहा?)
उत्तर: हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः। (हिरण्यक कबूतरों के गिरने के भय से चकित होकर चुपचाप बैठा रहा।)
(ज) पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति ? (पुलकित हिरण्यक चित्रग्रीव की कैसे प्रशंसा करता है?)
उत्तर: पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं प्रशंसति यत् साधु मित्र! साधु। अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि। (पुलकित हिरण्यक चित्रग्रीव की प्रशंसा करता है कि साधु मित्र! साधु। इस आश्रितवात्सल्य से तुम तीनों लोकों का स्वामित्व प्राप्त करने योग्य हो।)
(झ) कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः ? (कबूतरों ने अपनी रक्षा कैसे की?)
उत्तर: कपोताः बुद्धिबलेन संगठनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः। (कबूतरों ने बुद्धि बल और संगठन सामर्थ्य से अपनी रक्षा की।)
(ञ) नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन् ? (नायक के प्रेरक वचनों से सभी ने क्या किया?)
उत्तर: नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः। (नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सभी ने भय, शोक और संदेह को त्यागकर पुल निर्माण कार्य में लग गए।)
३. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत — (नीचे लिखे वाक्यों को पढ़कर ल्यप्-प्रत्यय वाले वाक्यों में परिवर्तित करें —)
(क) छात्रः कक्षां प्रविशति । संस्कृतं पठति ।
उत्तर: छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति।
(ख) भक्तः मन्दिरम् आगच्छति । पूजां करोति ।
उत्तर: भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति।
(ग) माता भोजनं निर्माति । पुत्राय ददाति ।
उत्तर: माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति।
(घ) सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति । देवं नमति ।
उत्तर: सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति।
(ङ) रमा पुस्तकं स्वीकरोति । विद्यालयं गच्छति ।
उत्तर: रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति।
(च) अहं गृहम् आगच्छामि । भोजनं करोमि ।
उत्तर: अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि।
(छ) तण्डुलकणान् विकिरति । जालं विस्तारयति ।
उत्तर: तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति।
(ज) व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते । भूमौ अवतरति ।
उत्तर: व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति।
४. उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत — (उदाहरण के अनुसार उपसर्ग के योग से क्त्वा के स्थान पर ल्यप्-प्रत्यय का प्रयोग करके पदों को परिवर्तित करें —)
उपसर्ग: सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र
(क) छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करोति ।
उत्तर: छात्रः गृहम् आगत्य (आ+गम्+ल्यप्) भोजनं करोति।
(ख) माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति ।
उत्तर: माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य (प्र+क्षल्+ल्यप्) पचति।
(ग) शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति ।
उत्तर: शिक्षकः श्लोकं विलिख्य (वि+लिख्+ल्यप्) पाठयति।
(घ) रमा स्थित्वा गीतं गायति ।
उत्तर: रमा उत्थाय (उत्+स्था+ल्यप्) गीतं गायति।
(ङ) शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति ।
उत्तर: शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य (प्र+नम्+ल्यप्) पठति।
(च) लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति ।
उत्तर: लेखकः आलोच्य (आ+लोच्+ल्यप्) लिखति।
५. पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत — (पाठ में प्रयुक्त उपयुक्त पद से रिक्त स्थान भरें —)
(क) सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् ।
(ख) जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत् ।
(ग) अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति ।
(घ) हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः ।
(ङ) यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम् ।
६. पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत — (पाठ में प्रयुक्त ल्यप्-प्रत्यय वाले पद के साथ उपयुक्त पद को जोड़ें —)
(क) गण्डक्याः तीरम् = गण्डकीतीरम्
(ख) तण्डुलानां कणाः = तण्डुलकणाः
(ग) जालस्य अपहारकाः = जालापहारकाः
(घ) अवपाताद् भयम् = अवपातभयम्
(ङ) कापुरुषाणां लक्षणम् = कापुरुषलक्षणम्
८. सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत — (सार्थक पद को जानकर संधि विच्छेद करें —)
(क) इत्याकर्ण्य = इति + आकर्ण्य
(ख) चित्रग्रीवोऽवदत् = चित्रग्रीवः + अवदत्
(ग) बालकोऽत्र = बालकः + अत्र
(घ) धैर्यमथाभ्युदये = धैर्यम् + अथ + अभ्युदये
(ङ) भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = भोजने + अपि + अप्रवर्तनम्
(छ) उपायश्चिन्तनीयः = उपायः + चिन्तनीयः
(ज) व्याधस्तत्र = व्याधः + तत्र
(झ) हिरण्यकोऽप्याह = हिरण्यकः + अपि + आह
(ञ) मूषकराजो गण्डकीतीरे = मूषकराजः + गण्डकीतीरे
(ट) अतस्त्वाम् = अतः + त्वाम्
योग्यताविस्तरः (Additional Information)
ग्रन्थपरिचयः (पुस्तक का परिचय)
प्रस्तुत पाठ हितोपदेश नामक ग्रंथ के मित्रलाभ प्रकरण से लिया गया है। इस ग्रंथ के लेखक पंडित नारायण शर्मा हैं। इस ग्रंथ में मूल्यवान, नीतिपूर्ण वचनों, सुभाषितों और कथाओं का संग्रह है। अतः यह ग्रंथ संस्कृत साहित्य में अत्यंत आदरणीय है। इस ग्रंथ में चार प्रकरण हैं – (१) मित्रलाभः (मित्रों का लाभ), (२) सुहृद्भेदः (मित्रों में फूट), (३) विग्रहः (विग्रह), (४) संधिः (संधि)। इसके अध्ययन से छात्र नीतिविद्या और संस्कृत भाषा में निपुण होता है।
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ (हितोपदेशः १.३६) पदच्छेदः – अल्पानाम् अपि वस्तूनाम् संहतिः कार्य-साधिका । तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः ।
अन्वयः – अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका । गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते ।
भावार्थः – छोटी, निर्बल वस्तुओं का भी समूह, अर्थात् संगठन, समुदाय लक्ष्य की सिद्धि में सहायक होता है। जैसे – घास के समूह से बनी रस्सी से मदमस्त हाथी भी बाँधे जाते हैं।
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौप्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ (हितोपदेशः १.३२) पदच्छेदः – विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः । यशसि च अभिरुचिः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम् ।
अन्वयः – अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति ।
भावार्थः – महापुरुषों का यह आचरण स्वभावसिद्ध ही होता है। जो कुछ भी हो, वे विपत्ति के समय धैर्य धारण करके समस्या के समाधान के लिए प्रयत्न करते हैं। संपत्ति और उन्नति में वे सभी का उपकार करते हैं। सभा में वे कुशलता से भाषण करते हैं। युद्ध में वे पराक्रम और शौर्य दिखाते हैं। यश के विषय में वे अभिरुचि प्रदर्शित करते हैं। शास्त्रों के विषय में भी वे अनुराग प्रकट करते हैं।
परियोजना कार्यम् (Project Work)
१. पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत — (पाठ से नीचे लिखे क्रियापदों के प्रयोग कौशल को जानकर उनके समान अन्य वाक्य बनाएँ —)
क्रियापद: तिरस्कुर्वन्ति, क्रियताम्, निवसति, आह, छेत्स्यति, सम्भाषसे, अब्रवीत्, उपसर्पति, युज्यते
उदाहरण: तिरस्कुर्वन्ति – दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति। (दुष्ट लोग सज्जन का तिरस्कार करते हैं।)
(क) क्रियताम्: त्वया कार्यं क्रियताम्। (तुम्हारे द्वारा कार्य किया जाए।)
(ख) निवसति: रामः अयोध्यायां निवसति। (राम अयोध्या में रहते हैं।)
(ग) आह: सः सत्यम् आह। (उसने सत्य कहा।)
(घ) छेत्स्यति: वृक्षं छेत्स्यति। (वृक्ष को काटेगा।)
(ङ) सम्भाषसे: त्वं मधुरं सम्भाषसे। (तुम मधुर बोलते हो।)
(च) अब्रवीत्: गुरुः शिष्यम् अब्रवीत्। (गुरु ने शिष्य से कहा।)
(छ) उपसर्पति: बालकः मातरम् उपसर्पति। (बालक माता के पास जाता है।)
(ज) युज्यते: इदं कार्यं मह्यं युज्यते। (यह कार्य मेरे लिए उचित है।)
२. अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु । (इस कथा से हम अपने जीवन में कौन सी शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, इस विषय पर कक्षा में चर्चा करें।)
उत्तर: इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एकता में बल है। छोटी-छोटी वस्तुओं का समूह भी बड़े कार्य को सिद्ध कर सकता है। विपत्ति के समय धैर्य और संगठन से काम लेना चाहिए। बिना सोचे-समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। महापुरुषों के गुण जैसे धैर्य, क्षमा, वाक्पटुता, पराक्रम, यश में अभिरुचि और शास्त्रों में आसक्ति को अपनाना चाहिए।
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