प्रथमः पाठः - संगच्छध्वं संवदध्वम्
अध्याय का हिंदी में सार
पहला पैराग्राफ (संवाद)
छात्र: नमस्ते आचार्य! हमारे विद्यालय के खेल उत्सव में फुटबॉल के खेल में हम जीत गए।
आचार्य: बधाई हो, आपका अभिनंदन है। क्या आप जानते हैं कि आपके प्रतिद्वंद्वी कैसे हार गए?
छात्र: हाँ, आचार्य! मैं जानता हूँ। हमारी टीम के खिलाड़ियों में आपस में अच्छा तालमेल था, लेकिन विरोधी टीम में ऐसा नहीं था।
आचार्य: सत्य है! उस टीम के खिलाड़ियों में आपस में मनमुटाव और द्वेष था। उन्होंने एक-दूसरे का सहयोग नहीं किया। तो बताइए, जीत के लिए क्या-क्या आवश्यक है?
छात्र: मिलकर काम करना, एकता और आपस में तालमेल आवश्यक है।
आचार्य: यह बिल्कुल सही कहा गया है। यही संदेश वेदों में 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' के रूप में दिया गया है।
छात्र: आचार्य! यह संदेश किस वेद से लिया गया है? और इसका क्या अर्थ है?
दूसरा पैराग्राफ (वेदों का परिचय और मंत्रों का आह्वान)
प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में 'वेद को साक्षात् ब्रह्मा के मुख से निकली हुई पवित्रतम दैवी वाणी' माना जाता है। वेद की चार संहिताएँ हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये वेद आज विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य के रूप में विद्वानों द्वारा माने जाते हैं। आप सभी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर, जूते बाहर रखकर, इस प्रार्थना सभा में उपस्थित हैं। अतः आइए, प्रणाम करके, आँखें बंद करके, एकाग्रचित्त होकर, एक साथ स्वर में वेदमंत्रों का उच्चारण करें।
तीसरा पैराग्राफ (पहला मंत्र और भावार्थ)
ओ३म्संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥ १ ॥ भावार्थ: (वेद के ऋषि 'आंगिरस' परमेश्वर के संदेश से मनुष्यों को उपदेश देते हैं) हे मनुष्यों! तुम सभी (संगच्छध्वं) अपने परिवार, समूह, समाज, राष्ट्र और विश्व में मिलकर आगे बढ़ो, मिलकर उन्नति प्राप्त करो। (संवदध्वं) आपस में अच्छी तरह विचार-विमर्श करते हुए एक स्वर में बोलो। (वः) तुम्हारे (मनांसि) मन के भावों को (संजानाताम्) अच्छी तरह जानो। आपस में मनमुटाव न हो।
जैसे सृष्टि के प्रारंभ में (देवाः) ब्रह्मा द्वारा रचित अग्नि, वायु, आदित्य आदि ब्रह्मांडीय शक्तियाँ (भागं) सृष्टि-निर्माण यज्ञ की सफलता के लिए अपने-अपने कर्तव्य को स्वीकार करके, (संजानानाः) आपस में उत्कृष्ट समन्वयपूर्वक (उपासते) अपना-अपना कार्य करती थीं।
उसी प्रकार तुम मनुष्य भी अपने कुटुंब, दल और लोक की प्रगति के लिए नित्य मिलकर अपने-अपने कर्तव्य का सुचारु रूप से निर्वाह करो। इस प्रकार तुम सभी वैमनस्य को त्यागकर एकता के भाव से जियो, और सभी अभीष्ट फल प्राप्त करो।
चौथा पैराग्राफ (दूसरा मंत्र और भावार्थ)
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ २ ॥ भावार्थ: (एषां) एक कार्य में साथ लगे हुए इन लोगों का (मन्त्रः) चिंतन (समानः) आपस में सौहार्दपूर्ण हो, और इनकी (समितिः) लक्ष्यसिद्धि (समानी) समान हो, (मनः) मन भी (समानं) सौमनस्यपूर्ण हो, तथा (चित्तं) बुद्धि से उत्पन्न ज्ञान भी (सह) एकीभूत हो।
हे मनुष्यों! (वः) तुम्हारे (समानं मन्त्रम्) आपसी मंत्रणा और संगठित संकल्प को (अभिमन्त्रये) मैं संस्कारित करता हूँ – दिव्य भाव से जोड़कर प्रकट करता हूँ। तथा (वः) संगठित तुम लोगों की (समानेन) सामूहिक (हविषा) प्रार्थना से (जुहोमि) मैं ज्ञानयज्ञ को संपादित करता हूँ।
इस प्रकार, ऋषि और महात्मा हमेशा सौमनस्यपूर्ण संकल्प और मंत्रणा को दिव्य भाव से जोड़कर समाज में प्रचारित करते हैं, और उसकी सफलता के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।
पाँचवाँ पैराग्राफ (तीसरा मंत्र और भावार्थ)
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ ३ ॥ भावार्थ: हे मनुष्यों! (वः) तुम्हारा (आकूतिः) संकल्प (समानी) समान हो। (वः हृदयानि) तुम्हारे हृदय (समाना) सामरस्यपूर्ण हों। (यथा) जिससे (वः) तुम्हारा (सह) संगठन (सु) सुंदर और उत्कृष्ट (असति) हो, तथा (वः मनः) तुम्हारा मन (समानम्) सामंजस्यपूर्ण और एकरूप (अस्तु) हो।
इसी से परिवार, समूह, समाज, राष्ट्र और विश्व में सुख, शांति और मैत्रीभाव विराजते हैं। इन मंत्रों से संगठित रूप से सहजीवन के लिए प्रेरणा मिलती है। इससे अपने जीवन और लोक में प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आयु, आरोग्य, विजय, समृद्धि, धर्म, ज्ञानप्राप्ति और आत्मतृप्ति होती है।
शब्दार्थ (Word Meanings)
अभ्यास (Exercises)
१. संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लिखत च। (संज्ञानसूक्त को सस्वर पढ़ें, याद करें और लिखें।)
उत्तर: यह एक अभ्यास कार्य है जिसमें छात्रों को संज्ञानसूक्त के मंत्रों को सस्वर पढ़ना, याद करना और लिखना है।
२. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत — (नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्य में लिखें —)
(क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत् ? (सभी का मन कैसा होना चाहिए?)
उत्तर: सर्वेषां मनः समानं सौमनस्यपूर्णं च भवेत्। (सभी का मन समान और सौहार्दपूर्ण होना चाहिए।)
(ख) सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः ? (संगच्छध्वं संवदध्वम् का क्या अभिप्राय है?)
उत्तर: सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य अभिप्रायः अस्ति यत् सर्वे मिलित्वा अग्रे गच्छन्तु, परस्परं सम्यक् विचारविनिमयं कुर्वन्तः एकस्वरेण वदन्तु च। (संगच्छध्वं संवदध्वम् का अभिप्राय है कि सभी मिलकर आगे बढ़ें, और आपस में अच्छी तरह विचार-विमर्श करते हुए एक स्वर में बोलें।)
(ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः ? (सभी क्या त्यागकर एकता के भाव से जिएँ?)
उत्तर: सर्वे वैमनस्यं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः। (सभी वैमनस्य को त्यागकर एकता के भाव से जिएँ।)
(घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति ? (इस पाठ में क्या प्रेरणा है?)
उत्तर: अस्मिन् पाठे संगठितरूपेण सहजीवनस्य, सुख-शान्ति-मैत्रीभावस्य च प्रेरणा अस्ति। (इस पाठ में संगठित रूप से सहजीवन की, और सुख-शांति-मैत्रीभाव की प्रेरणा है।)
३. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत — (रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण करें —)
(क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति । (परमेश्वर सब जगह व्याप्त है।)
प्रश्न: कः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति? (कौन सब जगह व्याप्त है?)
(ख) वयम् ईश्वरं नमामः । (हम ईश्वर को नमस्कार करते हैं।)
प्रश्न: वयं कं नमामः? (हम किसको नमस्कार करते हैं?)
(ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः । (हम एकता के भाव से जीते हैं।)
प्रश्न: वयं केन जीवामः? (हम किससे जीते हैं?)
(घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते । (ईश्वर की प्रार्थना से शांति प्राप्त होती है।)
प्रश्न: कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते? (किसकी प्रार्थना से शांति प्राप्त होती है?) अथवा कया शान्तिः प्राप्यते? (किससे शांति प्राप्त होती है?)
(ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि । (मैं समाज के लिए श्रम करता हूँ।)
प्रश्न: अहं कस्मै श्रमं करोमि? (मैं किसके लिए श्रम करता हूँ?)
(च) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः । (यह पाठ ऋग्वेद से संकलित है।)
प्रश्न: अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः? (यह पाठ किससे संकलित है?)
(छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः । (वेद का दूसरा नाम श्रुति है।)
प्रश्न: कस्य अपरं नाम श्रुतिः? (किसका दूसरा नाम श्रुति है?)
(ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति । (मंत्र वेदों में होते हैं।)
प्रश्न: मन्त्राः केषु भवन्ति? (मंत्र किसमें होते हैं?)
४. पट्टिकातः शब्दान् चित्वा अधोलिखितेषु मन्त्रेषु रिक्तस्थानानि पूरयत — (पट्टिका से शब्दों को चुनकर नीचे लिखे मंत्रों में रिक्त स्थान भरें —)
शब्द: संवदध्वं, समितिः, आकूतिः, भागं, मनः, हृदयानि, जानाना, समानं, मनो, हविषा, सुसहासति, मनांसि
(क) सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते । (ख) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ।** (ग) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति । ५. पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत — (पाठ में प्रयुक्त शब्दों को भाव के अनुसार आपस में जोड़ें —)
६. उदाहरणानुसारेण लट्-लकारस्य वाक्यानि लोट्-लकारेण परिवर्तयत — (उदाहरण के अनुसार लट्-लकार के वाक्यों को लोट्-लकार में परिवर्तित करें —)
उदाहरण: बालिकाः नृत्यन्ति -> बालिकाः नृत्यन्तु
उत्तर: युवां तत्र गच्छतम्
योग्यताविस्तरः (अतिरिक्त जानकारी)
१. वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।२. ब्राह्मण: ऐतरेय, शतपथ, सामविधान, गोपथ, इत्यादि।३. उपनिषद (प्रसिद्ध): ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, इत्यादि।४. उपवेद: आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, अर्थवेद / स्थापत्यवेद।५. वेदोपांग / षड्-दर्शन: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व-मीमांसा, उत्तर-मीमांसा (वेदांत)।६. वेदांग: शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प। ऋग्वेद में मंत्रों की संख्या: दस हजार, पाँच सौ, बावन (१०,५५२) मंत्र हैं। इस ग्रंथ का विभाजन दो प्रकार से होता है:१. मंडल क्रम: (१० मंडल, ८५ अनुवाक, १,०२८ सूक्त)२. अष्टक क्रम: (८ अष्टक, प्रत्येक अष्टक में ८ अध्याय, कुल ६४ अध्याय) इस पाठ का आधार ऋग्वेद के अंतिम दसवें मंडल का, अंतिम एक सौ इकानवेवाँ (१०.१९१) सूक्त है, जो 'संज्ञान-सूक्त' या 'संगठन-सूक्त' नाम से प्रसिद्ध है।
शब्द (संस्कृत) | अर्थ (संस्कृत) | हिंदी अर्थ | English Meaning |
संगच्छध्वम् | मिलित्वा गच्छत | मिलकर चलो | May you walk together |
संवदध्वम् | एकस्वरेण वदत | सहमतिपूर्वक बोलें | May you speak in one voice |
समवेतस्वरेण | सम्मिलित-स्वरेण | सम्मिलित ध्वनि से | By chanting in unison |
मनांसि | चित्तानि | मनों को | Minds |
जानताम् | जानन्तु | जानें | May you know |
देवाः | ब्रह्माण्डीय-शक्तयः / सृष्टि की मूलभूत वैश्विक-शक्तियाँ | ब्रह्मांडीय शक्तियाँ और आकाशीय घटनाएँ | Cosmic forces & celestial phenomena |
संजानानाः | एकमनसः भूत्वा | एक विचार वाले होकर | Being amicable |
उपासते | सेवन्ते | श्रद्धापूर्वक कर्तव्य निर्वहन | Devotedly performing |
अभ्युदयम् | अभिवृद्धिः | लौकिक उन्नति | Elevation and prosperity |
मन्त्रः | विचारः | चिंतन | Contemplation |
समितिः | समाना प्राप्तिः | समान सिद्धि | Common resolutions |
वः | युष्मभ्यम् | तुम्हारे | For you |
अभिमन्त्रये | संस्कृत्य प्रचारयामि | अभिमंत्रित करके प्रचारित करता हूँ | (I) Consecrate and propagate |
हविषा | प्रार्थनापूर्वक | प्रार्थना पूर्वक / यज्ञाहुति द्वारा | By oblatory prayers |
जुहोमि | ज्ञानकर्ममयं यज्ञं साधयामि | दिव्य यज्ञ कर्म को साधता/ती हूँ | Performing Yajña & divine offerings |
आकूतिः | संकल्पः | संकल्प | Resolution |
सु सह असति | सुसंघटितः भवेत् | सुसंघटित हो | May you be united |
संहिता | मूल मन्त्रपाठः | मूल वैदिक मंत्र पाठ | Original Vedic text |
ब्रह्मणा | सृष्टिकर्त्रा / परमेश्वरेण | सृष्टि के निर्माता / परमात्मा के द्वारा | By the creator of the universe |
निरवहन् | निर्वाहम् अकुर्वन् | निर्वाह किया | Took responsibility |
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